facebook Share on Facebook कोरोना संक्रमण की कथित दूसरी लहर के परिणाम काफी भयावह और डराने वाले हैं। इस लहर के चलते देश में रोजाना करीबन दो लाख मामले सामने आ रहे हैं, जोकि पूर्व के बनिस्पत काफी ज्यादा कहे जा सकते हैं। संक्रमण में अचानक तेज उछाल आने के बाद अस्पतालों पर भी काफी दबाव बढ़ गया है। ऑक्सीजन और बेड की कमी के साथ-साथ आवश्यक दवाओं के अभाव के समाचार भी सामने आने लगे हैं। अभी कोरोना जांच और इलाज में जो दिक्कतें सामने आ रही हैं, उसकी कई वजहें कही जा सकती हैं। वास्तव में पिछले वर्ष सितंबर माह के बाद जब कोरोना के संक्रमण में उतार दिखने लगा था, तब हमें यही लगने लगा कि अब हम बुरे दौर से उबर चुके हैं और हम इसके प्रति लापरवाह होने लगे। मार्च, 2020 की तुलना में भले ही जांच की रफ्तार काफी बढ़ गई थी, पीपीई किट व मास्क वगैरह देश में ही बनने लगे थे और टीका निर्माण में भी हमने सफलता प्राप्त कर ली थी, लेकिन हमारे देश की एक नियति यह भी है कि तमाम सुविधाएं अमूमन शहरों में सिमटकर रह जाती हैं। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कोरोना की टेस्टिंग काफी कम मात्रा में हो रही है। यह भी दीगर है कि छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कोरोना के सैंपल को जांच के लिए काफी दूर भेजा जाता है। इसकी एकमात्र वजह यही है कि आरटी-पीसीआर लैब हर जगह मौजूद नहीं है। अत: कोरोना की कथित दूसरी लहर में जब संक्रमण नए इलाकों, ग्रामीण हिस्सों में फैला, तब वहां के सैंपल अत्यधिक मात्रा में शहरी लैब में पहुंचने लगे। इससे इन लैब्स पर अत्यधिक भार पडऩा शुरु हो गया। इसी के चलते टेस्टिंग की रिपोर्ट भी देरी से मिलने लगी और कोरोना से पीडि़त गंभीर रोगियों को समय पर इलाज न मिलने से उन्हें भारी दिक्कतों से गुतरना पड़ रहा है। जो आरटी-पीसीआर रिपोर्ट 24 घंटे के अंदर मिल जाती थी, अब 48 या 72 घंटों के बाद मिलने लगी है। इस संकट से उबरने का यही उपाय है कि जिन लोगों में कोरोना के लक्षण नहीं हैं, वे आरटी-पीसीआर टेस्ट न कराएं। यह भी गौरतलब है कि देश में 99 फीसदी मरीज मामूली रूप से बीमार हैं और यह खुद-ब-खुद या मामूली इलाज से ठीक हो सकते हैं। हमें वास्तव में यह समझने की जरूरत है कि जांच घर की पर्याप्त संख्या होने के बावजूद हर जगह आरटी-पीसीआर की सुविधा मौजूद नहीं है। मौजूदा समय में जिस तरह से कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है, उससे सरकार के साथ साथ आम आदमी की टेंशन भी बढ़ती जा रही है। हालात यहां तक पहुंच चुके है कि स्थिति लॉकडाउन लगाने तक पहुंच चुकी है। कई बड़े शहरों में तो लॉकडाउन जैसी कड़ाई का आगाज भी हो गया है। छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की हालत काफी चिंतित करने वाली है। उत्तर प्रदेश में भी उन जिलों में लॉकडाउन लगाने की वकालत की जा रही है, जहां स्थिति काफी गंभीर है। पिछली बार जब 68 दिनों का देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया था, तब अर्थव्यवस्था को आघात लगने के साथ ही आम लोगों पर भी गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ा था। अब जबकि संक्रमण देश में काफी ज्यादा फैल गया है, इसलिए नए सिरे से रणनीति बनाने की दरकार है। चुनावी रैलियां और कुंभ जैसे बड़े आयोजन सुपर स्प्रेडर साबित हो सकते हैं और अगले चार-पांच हफ्तों में इसका असर दिखने भी लगेगा। यदि वास्तव में लॉक्डाउन लगाने जैसा कदम सरकार की ओर से उठाया जाता है, तो तमाम सुरक्षा उपायों के साथ ही लॉकडाउन को लगाया जाना चाहिए। इसके साथ ही चुनावी जलसों पर भी तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों पर विशेष चौकसी बरतने जैसे कदम भी उठाए जाने चाहिए। यदि हम यूं ही कोरोना के प्रति लापरवाही बरतते रहे, तो आने वाले दिन काफी भयावह हो सकते हैं और इससे हमें आर्थिक व मनोवैज्ञानिक चोट पहुंच सकती है। इसके बाद सख्त कदमों का कोई अर्थ भी नहीं रह जाएगा।

more news....