facebook Share on Facebook देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब महज तीन राज्यों में ही सिमटकर रह गई है और इन तीनों राज्यों से अंतर्कलह की खबरें सामने आ रही हैं। राजस्थान का गहलोत-पायलट विवाद और पंजाब का अमरिंदर-सिद्धू विवाद किसी से छिपा नहीं है और अब छत्तीसगढ़ का भूपेश बघेल-टीएस सिंह देव विवाद पैर पसारने लगा है। छत्तीसगढ़ में साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की थी, लेकिन उस वक्त तय नहीं था कि मुख्यमंत्री पद किसे दिया जाए। हालांकि चर्चा में तब के प्रदेश अध्यक्ष रहे भूपेश बघेल और रमन सिंह सरकार के समय में विपक्ष के नेता रहे टीएस देव सिंह का नाम चल रहा था, मगर बाजी भूपेश बघेल ही मार ले गए। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव प्रदेश सरकार की नीतियों से खुश नजर नहीं आ रहे हैं। उन्होंने नई स्वास्थ्य योजना को लेकर कहा कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में अनुदान प्राप्त निजी अस्पताल मरीजों से चिकित्सा शुल्क लेते हैं, तब यह निशुल्क स्वास्थ्य सेवा की अवधारणा के खिलाफ है। वह इस तरह की योजना के पक्ष में नहीं हैं तथा इस संबंध में उनसे कोई चर्चा नहीं की गई है। उनकी इस नाराजगी के कई मायने निकाले जा रहे हैं। कांग्रेस की आपसी अंतर्कलह ही उसके पतन का कारण बनती जा रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता ही अब नाराजगियां जाहिर कर रहे हैं और नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे हैं, जबकि पार्टी शीर्ष की ओर से अपनी छवि को सुधारने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया जा रहा है। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में अपने युवा और काबिल नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को खोने के बाद एक तरह से मध्य प्रदेश को भी खो दिया है। राहुल गांधी अपने सबसे अच्छे मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी नहीं संभाल पाए। इसके बाद जितिन प्रसाद के जाने के बाद पार्टी को जो नुकसान हुआ है, उसे पार्टी का आम कार्यकर्ता तो समझता है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व शायद इसे समझना ही नहीं चाहता है। अगर ऐसी ही स्थिति रही, तो आने वाले लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस पूरी तरह से बिखर सकती है, क्योंकि पंजाब और राजस्थान के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी अंतर्कलह शुरू हो चुकी है। यह दीगर है कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था। जिसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस एक बार और तब हार गई, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा के साथ चले गए और मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार गिर गई। कांगे्रेस को समय रहते पार्टी के भीतर के मामलों को सुलझाने का प्रयास शुरु कर देना चाहिए। इस समय हालात यह हैं कि पार्टी अपने दम पर कोई भी चुनाव जीतने की क्षमता नहीं रखती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को ही आगे बढ़ते हुए पार्टी के लगातार कम होते जनाधार को बचाने के लिए कोशिश करनी चाहिए। ऐसा लगता है कि जैसे कांग्रेस ने चुनाव जीतने की सारी क्षमताएं तथा इच्छाशक्ति खो दी हैं। उधर, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में भाजपा एवं अन्य पार्टियां विधानसभा चुनावों की रणनीतियां बनाने में जुट गई हैं। अरविंद केजरीवाल ने तो पंजाब में आप की सरकार बनाने के लिए दाव फेंकना भी शुरु कर दिया है। उन्होंने पंजाबवासियों के लिए फ्री बिजली देने जैसे लोक लुभावन ऐलान तक कर डाले हैं। एक समय ऐसा लग रहा था कि महागठबंधन के लिए कांग्रेस एक नेतृत्व उपलब्ध करवा सकती है, मगर वह तो स्वयं ही गिरावट की ओर चल रही है। यही वह समय है, तब कांग्रेस को न सिर्फ पूरी तरह से जागना होगा, बल्कि अपनी साख को भी सुधारना होगा।

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